1857 की इंकलाब का हिस्सा बनने के बाद आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर (र.अ.) अंग्रेजों के साजिश का शिकार हुए। अंग्रेजों ने उन्हें भारत से देश बदर करके रंगून भेज दिया। 7 नवंबर, 1862 को वो दूनिया-ए-फानी को अलविदा कर दिये । अब सवाल उठता है कि मुगलों के आखिरी बादशाह के इंतकाल के बाद खानदान का क्या हस्र हुआ? उनका खानदान पश्चिम बंगाल में क्यों रह रहा, क्यों मुगल सल्तनत के किलों में नहीं रह रहा? आखिरी मुगल बादशाह के खानदान के बारे में आइये तफसीर से जानते हैं।

बाबर ने हिन्दुस्तान में जिस मुगल सल्तनत की बुनियाद रखी थी, बहादुर शाह जफर (र.अ.) उसके आखिरी बादशाह थे। जब बहादुर शाह जफर ने साल 1857 की इंकलाब की पेशवाई की तो अंग्रेजों के गुस्से का शिकार बन गए। दिल्ली पर कब्जा करने के बाद अंग्रेजों ने उन्हें देश बदर कर दिया। वहीं पर 7 नवंबर 1862 को उनका इंतकाल हो गया। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर मुगलों के आखिरी बादशाह के फौत होने के बाद उनके खानदान का क्या हुआ होगा।? उनका खानदान पश्चिम बंगाल में क्यों रह रहा? आइये तफसीर से जानते हैं इन्ही सब बातों का जवाब ।
सैयद मेंहदी हसन की एक किताब है- बहादुर शाह जफर एंड द वार ऑफ 1857 इन डेली । इसमें उन्होंने बहादुर शाह जफर के मुलाजिम रहे अहमद बेग के हवाले से लिखा है कि रंगून में अंग्रेजों की बंंदिश में रहने की वजह से बादशाह की तबीयत 26 अक्टूबर 1862 से ही खराब हुई थी। वह बड़ी मुश्किल से खाना खा पा रहे थे। धीरे-धीरे उनकी तबीयत और भी खराब होती चली गई। 2 नवंबर को मुगल बादशाह की हालत काफी खराब हो गई।
3 नवंबर को डॉक्टर ने बताया कि बादशाह की गले की हालत काफी खराब है और वह थूक तक नहीं निगल पा रहे। 6 नवंबर को डॉक्टर ने बताया कि बादशाह के गले को लकवा मार गया है। यह उनको पड़ा तीसरा लकवा था। इसके अगले ही दिन यानी सात नवंबर को मिर्जा अबू जफर सिराजुद्दीन मुहम्मद बहादुर शाह जफर यानी भारत के आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर ने हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं।

रंगून की गलियों से जमशेदपुर तक: टोकरी में सफ़र करता आया बादशाह का परपोता
मौजूदा हाल में बहादुरशाह जफर के वारिसिन पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से सटे हावड़ा में रहते हैं। जो दिल्ली से करीब 1500 किलोमीटर दूर है। उनके परपोते की अहेलिया सुल्ताना बेगम अब 60 साल की हो चुकी हैं। हावड़ा की झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाली सुल्ताना बेगम की कहानी अक्सर मीडिया में आती रहती है। बेहद परेशानियों और अजीयतों से भरा जीवन गुज़ारा करने वाली सुल्ताना बेगम ने मीडिया रिपोर्ट्स में बताया है कि बादशाह बहादुर शाह जफर के साथ ही उनके खानदान को भी रंगून (म्यांमार) भेज दिया गया था। वहीं पर उनके शौहर मिर्जा बेदार बख्त के वालिद और बादशाह के पोते का जन्म साल 1920 में हुआ था। तब तक उनके वालिदैन यानी बादशाह के बेटों का भी इंतकाल हो चुका था।
सुल्ताना बेगम के शौहर की पैदाइस होने पर अंग्रेजों ने उनको रंगून से बाहर ले जाने पर रोक लगा दी थी लेकिन मिर्जा बेदार के नाना ने एक टोकरी में उन्हें फूलों के नीचे छिपा दिया और पैदल ही रंगून से निकल गए। किसी तरह बचते-बचाते वह जमशेदपुर पहुंच गए।

शौहर के इंतकाल के बाद हावड़ा पहुंचीं सुल्ताना बेगम
मिर्जा बेदार बख्त का साल 1980 में इंतकाल हो गया। शौहर के इंतकाल के बाद सुल्ताना बेगम पश्चिम बंगाल चली गईं और हावड़ा की एक झुग्गी में बने दो कमरों की झोपड़ी में रहने लगीं। वहां वह कपड़े धोने के लिए सड़क के किनारे आवामी नल का इस्तेमाल करती थी। खाना पकाने के लिए पड़ोसियों के साथ रसोई साझा करनी पड़ती थी। काफी अरसे बाद अंग्रेजों ने और बाद में भारत सरकार ने बहादुर शाह जफर के वारिसिन के लिए भी पेंशन की व्यवस्था की।
लेकिन, यह पेंशन बेहद कम है। बहादुर शाह जफर का कानूनी वारिस होने के वजह पहले मिर्जा बेदार बख्त को भी पेंशन मिलती थी। यह पेंशन उनके इंतकाल के बाद सुल्ताना बेगम को मिलने लगी। केंद्र सरकार की ओर से दी जाने वाली यह पेंशन 6 हजार रुपए महीना है। सुल्ताना बेगम के साथ ही उनकी गैर शादीशुदा बेटी मधु बेगम भी रहती हैं।
सुल्ताना बेगम हावड़ा में चलाती हैंः चाय की दुकान
बेहद कम पेंशन में गुजारा करना मुश्किल है। ऐसे में सुल्ताना बेगम को कई छोटे-मोटे काम करने पड़े। उन्होंने औरतों के कपड़े बेचे पर बात नहीं बनी। माली हालत में फिर भी कोई सुधार नहीं आया। इसके बाद सुल्ताना बेगम ने हावड़ा में चाय की दुकान खोल ली। उसी के जरिए अपना और अपनी बेटी का खर्च सम्भालती हैं। जिन मुगलों ने आगरा से लेकर पूरे देश पर हूकूमत किया, फतेहपुर सीकरी जैसे जाने कितने शहर बसाए, किले बनवाए, जिसका आखिरी बादशाह दिल्ली के लालकिले से शासन करता था, अब उसी के वारिसिन गुमनामी में जिन्दगी गुजार रहे हैं।

बहादुर शाह ज़फ़र की जागीर पर जताया अपना हक़
सुल्ताना बेगम ने अपने हक के लिए बार-बार अदालतों में अपील की पर उनकी ज्यादातर अर्जि़याँ कानूनी तकनीकी के वजूहात से खारिज कर दी गई। साल 2021 में उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट में एक अर्जी पेश करके लालकिले पर दावा किया था लेकिन कोर्ट ने यह कहते हुए अर्ज़ी खारिज कर दी थी कि यह बहुत देर से पेश की गई है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में भी मदद की पुकार लगाई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल (2025) मई में उनकी अर्ज़ी को गलत बता कर खारिज कर दिया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एक न्यायाधीश ने इस अर्ज़ी पर यहां तक सवाल किया था कि लाल किला ही क्यों? फतेहपुर सीकरी क्यों नहीं?
इस बारे में सुल्ताना बेगम का जवाब था कि हमने लाल किला या फतेहपुर सीकरी नहीं मांगा था। हमने तो बस इतना कहा था कि अगर हम बहादुर शाह जफर के वारिस हैं तो फिर उनका रिहाइस गाह तो हमें दिया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि सर्वोच्च अदालत से ही मेरी उम्मीद बची थी, अब वह भी खत्म हो गई।
लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में !
किस की बनी है आलम-ए-ना-पाएदार में !!
इन हसरतों से कह दो कहीं और जा बसें !
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़-दार में !!
काँटों को मत निकाल चमन से ओ बाग़बाँ !
ये भी गुलों के साथ पले हैं बहार में !!
बुलबुल को बाग़बाँ से न सय्याद से गिला !
क़िस्मत में क़ैद लिक्खी थी फ़स्ल-ए-बहार में !!
कितना है बद-नसीब ‘ज़फ़र’ दफ़्न के लिए !
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में !!










