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हमास और इजरायल के बीच Ceasefire पर ईरान और अरब देशों के मीडिया में विभिन्न प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं।

हमास और इजरायल के बीच Ceasefire पर ईरान और अरब देशों के मीडिया में विभिन्न प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं।
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इजरायल और हमास के बीच सुलह का गज़ा में खुशी मनाती महिलाएं।

हमास और इजरायल ने एक Ceasefire पर सहमति व्यक्त की है, जिसके तहत ग़ज़ा में जारी जंग को रोका जाएगा। इस सुलहके अनुसार, इजरायलअपने बंधकों को रिहा करेगा, जबकि इसके बदले में फ़लस्तीनी क़ैदियों को आज़ाद किया जाएगा।

अमेरिका और मध्यस्थ क़तर ने इस Ceasefire सुलहका एलान किया। पिछले 15 महीने से चली आ रही लड़ाई में इसे अहम कामयाबी के रुप में देखा जा रहा है। ये जंग सात अक्तूबर 2023 को हमास के इजरायलपर हमले के बाद से जारी है।

ईरान और अरब देशों के मीडिया में इस सुलहपर ख़ूब चर्चा हो रही है। ईरानी मीडिया की कुछ खबरों में इसे फ़लस्तीनी सशस्त्र गुट हमास की शानदार के तौर पर देखा जा रहा है। वहीं अरब देशों की प्रेस में ये कहा जा रहा है कि शायद ये समझौता अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बिना मुकाम तक नहीं पहुंचता।


इजरायल की ‘शर्मनाक हार’

ईरान का अधिकांश मीडिया इस सुलह को हमास और रेज़िस्टेंस फ्रंट की जीत के तौर पर देख रहा है।

क़तर ने 15 जनवरी को घोषणा की थी कि इजरायलऔर हमास Ceasefire और बंधकों-कैदियों की अदला-बदली के सुलहपर पहुंच गए हैं।

क़तर के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री मोहम्मद बिन अब्दुल रहमान अल थानी ने घोषणा की कि यह सुलह 19 जनवरी से लागू होगा। उन्होंने कहा कि सुलह में तीन मरहले  शामिल हैं।

ईरानी मीडिया ने इजरायल और हमास के बीच हुए Ceasefire  सुलहपर विस्तार से ख़बरें और लेख प्रकाशित किये हैं।

 ईरान के सरकारी टेलीविज़न चैनल ने अपने मुख्य समाचार में Ceasefire को इजरायल के लिए शर्मनाक हार बताया है।

इस ख़बर में कहा गया कि जंग में अपनी पूरी ताकत झोंकने के बावजूद इजरायल हमास को ख़त्म करने में नाकामयाब रहा है। वहीं, एक विश्लेषक  Ceasefire को ईरान के ‘रेज़िस्टेंस फ़्रंट’ की शानदार जीत को रुप मे देखते है।

16 जनवरी को ईरान के रेडियो और टीवी चैनलों ने बताया कि ‘रेज़िस्टेंस की जीत’ के बाद फ़लस्तीन से लेकर लेबनान, यमन, इराक़, तुर्की और इस क्षेत्र के अन्य देशों में जश्न मनाया गया।

ब्रॉडकास्ट मीडिया और दूसरे आउटलेट्स ने भी ये बताया कि हमास के वरिष्ठ सदस्य खलील अल-हय्या ने समूह को मदद करने में ईरान की भूमिका के लिए उसे शुक्रिया कहा है।

सुधारवादी विचारधारा वाले अख़बार अरमान-ए-इमरोज़ ने सुलहके एलान के कुछ घंटों बाद एक लेख में ये कहा कि डोनाल्ड ट्रंप ने हाल में धमकियां दी थी कि अगर बंधकों को रिहा नहीं किया गया तो बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।

ऐसा प्रतीत होता है कि इन धमकियों के वजह से ही हमास सुलह के लिए राजी हुआ होगा। अख़बार ने ये भी कहा है कि ट्रंप का अमेरिका का राष्ट्रपति बनना इजरायलके लिए भी चुनौती हो सकता है।

सरकारी दैनिक अख़बार ‘ईरान‘ ने राजनीति के दो जानकारों का हवाला देते हुए कहा कि ये सौदा ‘इजरायलकी रणनीतिक हार’ और ‘7 अक्तूबर के बाद के दौर की शुरुआत’ दिखाता है, जिसमें इजरायलकमज़ोर और बेअसर है।

सरकारी अख़बार जाम-ए-जम ने कहा कि इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने ‘घुटने टेक दिए’। वहीं,इसी तरह तेहरान की नगरपालिका के अख़बार ‘हमशहरी’ ने भी इसी तरह के विचार व्यक्त किए हैं।

हमशहरी ने ये भी कहा है कि इजरायलको इस सौदे को ‘स्वीकार करने के लिए मजबूर’ किया गया था। इस घटना के पीछे ट्रंप द्वारा नेतन्याहू को दी गई चेतावनी और हमास द्वारा कथित तौर पर इसराइली सेना को हराने जैसे वजह बताए गए हैं।।

रूढ़िवादी सोच के दैनिक अख़बार फ़रहिख़्तेगन ने लिखा, “हमास ठहरा, लेकिन इजरायल सुरक्षित नहीं हो सका।”

अख़बार ने इजरायल के ख़िलाफ़ की गई जवाबी कार्रवाई की चेतावनी और ईरान के हालिया सैन्य अभ्यासों की तारीफ की।

उधर, कट्टरपंथी विचारधारा वाले दैनिक अख़बार कुद्स ने 7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा इज़राइल पर किए गए हमले को शानदार जीत करार दिया। वहीं वतन-ए-इमरोज़ ने बेंजामिन नेतन्याहू और इसराइली कैबिनेट को हारा हुआ कातिल कहा है।

सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल (एसएनएससी) से जुड़े नूर न्यूज़ ने Ceasefire को फ़लस्तीनी ‘प्रतिरोध’ के लिए महत्वपूर्ण जीत के रूप में बताया है। नूर न्यूज़ ने कहा है कि ये समझौता इजरायलकी रणनीतियों के लिए बड़ी हार का प्रतीक है।

कट्टरपंथी न्यूज़ वेबसाइट ‘मशरेक’ ने सुलह को इजरायल के लिए शर्मनाक हार बताया है।

सोशल मीडिया पर क्या कहा जा रहा है?

Ceasefire के एलान के बाद तेहरान के लोगों ने खुशी में पटाखे जलाए।

ईरान और उसके सहयोगियों के क्षेत्रीय नेटवर्क ‘ऐक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस’ के समर्थक इस Ceasefire सुलहका जश्न मना रहा है। सोशल मीडिया पर खुशी ज़ाहिर करने वाले लोग इसे “हमास की शानदार जीत” और ईरान के साथ उसके क्षेत्रीय सहयोगियों की कोशिशों का नतीजे के तौर पर देख रहे हैं।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कई पोस्ट्स में कहा गया है कि ग़ज़ा में जंग के अपने लक्ष्यों को हासिल करने में इजरायल विफल रहा है और ‘रेज़िस्टेंस’ की इजरायल के ख़िलाफ़ लड़ाई जारी है

ईरान समर्थक एक यूजर ने लिखा, “हमास का अंत, बंधकों की रिहाई, और उत्तरी क्षेत्रों के निवासियों की अपने घरों में वापसी – इनमें से कुछ भी हासिल नहीं हुआ, इसलिए उन्हें  Ceasefire पर हस्ताक्षर करना पड़ा।”

सोशल मीडिया पर कई लोगों ने ग़ज़ा में ‘इजराइली अपराधों‘ को भी उजागर किया और ‘रेज़िस्टेंस’ के फ़लस्तीनी, लेबनानी और ईरानी ‘शहीदों’ को याद किया

हालांकि, कई सत्ता विरोधी यूज़र ने कहा कि ये सौदा ट्रंप के राष्ट्रपति कार्यकाल में इजरायलके लिए बढ़ते अमेरिकी समर्थन के डर से, हमास के Ceasefire स्वीकार करने के लिए मजबूर होने का परिणाम था।

कुछ यूज़र ने सवाल किया है कि हमास और ‘रेज़िस्टेंस’ ने सात अक्तूबर के हमले से “फ़लस्तीनी महिलाओं और बच्चों की मौत, हिज़्बुल्लाह और हमास पर आई सभी विपदाओं के अलावा क्या हासिल किया।”

अरब देशों की मीडिया में ट्रंप पर चर्चा

अरब देशों की मीडिया में ट्रंप पर चर्चा जोरो पर हैं।

अरब प्रेस और वेबसाइटों में ग़ज़ा जंग विराम के बारे में कुछ टिप्पणीकारों ने ये तर्क दिया है कि अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ‘प्रभाव’ के बिना ये समझौता नहीं हो सकता था।

वहीं, अन्य लोगों ने ये उम्मीद जताई है कि ये समझौता प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू की अगुवाई वाली इसराइली गठबंधन सरकार के भीतर राजनीतिक दरार पैदा करेगा। जबकि कुछ ये भी सवाल कर रहे हैं कि क्या सुलहका मतलब है कि जंग हमेशा के लिए ख़त्म हो गया?

इजरायलके एक फ़लस्तीनी नेता और वहां की संसद के पूर्व सदस्य जमाल ज़हलका ने लंदन से छपने वाले अरबी अख़बार अल-कुद्स अल-अरबी में लिखा कि ये समझौता महीनों पहले हो सकता था, लेकिन ‘मुख्य अड़चन नेतन्याहू की स्थिति’ थी।

ज़हलका ने तर्क दिया है कि नेतन्याहू ने अपना मन बदल लिया और ट्रंप के प्रभाव की वजह से ही सुलह पर सहमत हुए।

उन्होंने लिखा, “ट्रंप इजरायलके राजनीतिक वर्ग को प्रभावित करते हैं। नेतन्याहू ईरानी परमाणु कार्यक्रम, सऊदी अरब के साथ संबंधों के सामान्यीकरण, वेस्ट बैंक में बस्तियों को वैध बनाने, यमन की नाकाबंदी, सीरिया में तुर्की के प्रभाव को सीमित करने और इजरायलके सैन्य उद्योग में अमेरिकी निवेश को बढ़ाने सरीखे अहम मुद्दों पर ट्रंप और उनके प्रशासन के साथ गर्मजोशी से भरे रणनीति सहयोग की उम्मीद कर रहे हैं।”

अनुभवी फ़लस्तीनी चिंतक मुनीर शफ़ीक़ ने अल-जज़ीरा की वेबसाइट पर भी इसी तरह की बात लिखी है।

उन्होंने लिखा, “ग़ज़ा जंग को शायद पहले महीने में ही रोका जा सकता था, अगर नेतन्याहू की ‘आपराधिक ज़िद’ और बाइडन प्रशासन की ओर से ज़ायनिस्ट सेना और नेतन्याहू को आक्रामकता जारी रखने के लिए समर्थन न होता।”

शफ़ीक ने लिखा, “नेतन्याहू ने सैन्य हार से बचने के लिए अपने संकीर्ण व्यक्तिगत हितों को आगे रखा।”

उन्होंने लिखा, “डोनाल्ड ट्रंप के डर के बिना, नेतन्याहू इस सुलहको मंज़ूरी देने के लिए तैयार नहीं होते।”वहीं सीरिया के सरकारी टीवी चैनल अल-काहिरा न्यूज़ की वेबसाइट ने भी कहा है कि इस Ceasefire सुलह तक पहुंचने में सबसे प्रमुख कारण ‘अंतरराष्ट्रीय दबाव’ था, ख़ासतौर पर ट्रंप की ओर से।

गज़ा की सड़को पर जश्न मनाते लोग।

मोरक्को के टिप्पणीकार मोहम्मद अहमद बेनिस ने अरब-अल-अरबी-अल-जदीद अख़बार में लिखा है कि Ceasefire समझौता ‘नेतन्याहू को सरकारी गठबंधन में उनके धुर-दक्षिणपंथी सहयोगियों को लेकर दुविधा में डाल देगा।’

बेनिस ने लिखा है, “ग़ज़ा में Ceasefire ज़ायनिस्ट दक्षिणपंथियों के लिए राजनीतिक झटका है, क्योंकि वह इजरायलकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भारी कीमत चुकाए बिना बंधकों को मुक्त कराना चाहते थे।”

वहीं यूएई के स्काई न्यूज़ अरेबिया वेबसाइट ने तर्क दिया है कि Ceasefire सुलह से तभी जंग रुकेगी जब इसकी शर्तें मानी जाएंगी। हालांकि, ये कहना कि Ceasefire से जंग हमेशा के लिए टल जाएगी थोड़ी जल्दबाजी होगी।

इस लेख में कहा गया है कि Ceasefire संभवतः नाज़ुक है और कोई भी छिट-पुट घटना इस सुलह के लिए ‘बड़ा ख़तरा’ साबित हो सकती है।

मोरक्को के शिक्षाविद और टिप्पणीकार तारिक़ लिसूई ने लंदन की वेबसाइट राय अल-यूम में लिखा, “आने वाले दिनों में हम अंतरराष्ट्रीय न्यायलयों की ओर से जंग अपराध के वांछित नेतन्याहू की सरकार का तेज़ी से पतन होते देखेंगे।”

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1 thought on “हमास और इजरायल के बीच Ceasefire पर ईरान और अरब देशों के मीडिया में विभिन्न प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं।”

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